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कोरोनाकाल ने लोगो के खुशियों की तस्वीरे बदल डाली, दरअसल अक्षय तृतीया पर इस बार नगर एवं गांवों में ना तो गाजा बाजे का शोर सुनाई पड़ेगा और ना ही बरातियों एवं नाते रिश्तेदारों की चहल पहल

मनीराम सिन्हा नरहरपुर- लगातार दो वर्षों से कोरोनाकाल ने लोगो के खुशियों की तस्वीरे बदल डाली है दरअसल अक्षय तृतीया पर इस बार नगर एवं गांवों में ना तो गाजा बाजे का शोर सुनाई पड़ेगा और नही बरातियों एवं नाते रिश्तेदारों की चहल पहल एवं गहमागहमी नजर आयेगी यदि छूटपूट शादियां भी होंगी तो शासन प्रशासन द्वारा जारी की गई गाईड लाईन का पालन करना होगा अक्षय तृतीया जिसे छत्तीसगढ़ में अक्ती त्यौहार कहा जाता हैं। 14 मई को मनेगा अक्षय तृतीया के मुहूर्त को अक्षय माना जाता है अर्थात इस दिन शादी ब्याह या अन्य किसी शुभ कार्य के लिए मुहुर्त की जरूरत नहीं होती यहीं कारण है कि छत्तीसगढ़ के गांवों में इस त्यौहार पर बड़े पैमाने पर शादियां होती है, यह परम्परा छत्तीसगढ़ में सदियों से चली आ रहीं हैं । नरहरपुर ब्लॉक मुख्यालय में इस दिन हर अधिकांश गांवों में 8,10 या उससे अधिक शादियां सम्पन्न होती हैं आज के दिन हर गांवों में शादियों की गहमागहमी रहती हैं, गांवों में जहां लाउडस्पीकर से लेकर छत्तीसगढ़ के पारम्परिक गड़वा बाजा और मोहरी, की धुन से पूरा गांव गुलजार रहता है. वहीं बरातियों तथा शादियों में भाग लेने वाले नाते रिश्तेदारों की भीड़भाड़ से गांव का महौल पूरी तरह शादीमय रहता हैं लोग इस उत्सव में पूरे उत्साह से शामिल होते हैं, बारात जाने के लिए लोगों के बीच होड़ लगी रहती हैं,बसों, ट्रक से लेकर मेटाडोर और ट्रेक्टर में भी सवार होकर लोग बारात में शामिल नजर आते हैं. यह दृश्य पूरे   छत्तीसगढ़ नजर आता हैं. किन्तु इस बार शादियों का यह नजारा गांवों में नजर नहीं आयेगा दरअसल कोरोना महामारी के चलते गांवों में भी लोग लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं. इस दौरान किसी भी तरह के सामाजिक, धार्मिक उत्सव पर प्रतिबंध लगा हुआ है. हालांकि शासन छत्तीसगढ़ की परम्परा कोदेखते हुए सिर्फ 10 लोगों की उपस्थिति में शादी संपन्न कराने की अनुमति दी हैं. जो शर्ते लगाई गई है उसके तहत सभी को मास्क लगाने के साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग का भी पालन करना होगा. ऐसे माहौल इस बार अक्षय पर पहले की तरह गांवों में बड़े पैमाने पर शादियां टाल दी गई हैं।
बच्चे नहीं रचा पाएंगे पुतरा-पुतरी की शादी
अक्षय तृतीया या अक्ति पर छत्तीसगढ़ में पुतरा पुतरी का विवाह रचाने की परंपरा सदियों से चली आ रही हैं खासकर बच्चों को इस दिन का बेसव्री से  इंतजार रहता है पुतरा पुतरी का विवाह रचाने बच्चे सुबह से ही तेयारियों में जूट जाते थे, मण्डप सजाने से लेकर पुतरा पुतरी का श्रृंगार करने तथा विवाह की अन्य तैयारियों में बच्चों का पूरा दिन वितता था। शाम होते ही पूरे रस्मों रिवाज से पुतरा पुतरी का विवाह रचाया जाता था इसमें घर केबड़े बुजुर्गों से लेकर आस पड़ोस के लोग भी शामिल होकर बच्चों का उत्साह वर्धन करते थे इस पर्व केलिएविशेष तौर पर पुतरा पुतरी का बाजार भी सजता था किन्तु इस वर्ष भी कोरोना केचलते बच्चे इससे वंचित रहेंगे लॉकडाउन के कारण जहां बच्चे घरों में बंद हैं, पुतरा पुतरी का बाजार भी अब तक नहीं सज पाया हैं।

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